दर्शन उपनिषद् · DAR-102
केनोपनिषद्
Kena Upaniṣad
केनोपनिषद्
केनोपनिषद् सामवेद से सम्बन्धित है और एक गहन प्रश्न से आरम्भ होता है — मन किसकी प्रेरणा से चलता है, और वाणी, नेत्र तथा श्रोत्र किसके द्वारा कार्य करते हैं? चार छोटे खण्डों में यह उपनिषद् ब्रह्म को 'श्रोत्र का श्रोत्र' और 'मन का मन' बताता है — जिसे विषय की तरह नहीं, बल्कि जानने के आधार के रूप में ही जाना जाता है। देवताओं, रहस्यमय यक्ष और उमा हैमवती की कथा इस शिक्षा को जीवन्त बना देती है। आदि शंकराचार्य के भाष्य के साथ यह उपनिषद्-अध्ययन का आदर्श आरम्भ है।
आप क्या सीखेंगे
- इन्द्रियों के पीछे की शक्ति पर केन का मूल प्रश्न
- ब्रह्म को विषय के रूप में क्यों नहीं जाना जा सकता
- यक्ष और उमा हैमवती की कथा का अर्थ
पाठ
- 1परिचय: केनोपनिषद्🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 2'केन?' — आरम्भिक जिज्ञासा🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 3श्रोत्र का श्रोत्र🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 4जानना और न जानना🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 5देवता, यक्ष और उमा🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 6शांकर भाष्य और साधना🔒 नामांकन के बाद खुलेगा