भक्ति स्तोत्र · BHK-103
गोपी गीत
Gopī Gīta
गोपी गीत
गोपी गीत श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के इकतीसवें अध्याय में व्रज की गोपियों का गान है, जो रासपञ्चाध्यायी का अंग है। जब चाँदनी रात के रास से श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो जाते हैं, तब गोपियाँ उन्नीस श्लोकों की अनुपम कविता में अपनी विरह-वेदना उँड़ेल देती हैं और उनके रूप, लीलाओं तथा प्रेम का स्मरण करती हैं। विरह-भक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्तियों में गिने जाने वाले इस गीत का यहाँ संस्कृत मूल के साथ हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ सहित श्लोक-दर-श्लोक अध्ययन होगा।
आप क्या सीखेंगे
- गोपी गीत का रास-लीला प्रसंग
- प्रत्येक श्लोक का अर्थ और काव्य-सौन्दर्य
- विरह-भक्ति: वियोग में प्रेम का दर्शन
पाठ
- 1परिचय: रासपञ्चाध्यायी🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 2श्रीकृष्ण का अन्तर्धान: कथा-प्रसंग🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 3विरह और स्मरण के श्लोक🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 4गीत में श्रीकृष्ण का रूप और लीला🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 5विरह-भक्ति: वियोग में प्रेम🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 6गोपी गीत का पाठ और मनन🔒 नामांकन के बाद खुलेगा