भक्ति स्तोत्र · BHK-110
प्रसाद
Prasāda
प्रसाद
प्रसाद का अर्थ है 'कृपा': वह भोजन या अन्य सामग्री जो पहले भगवान को अर्पित की जाती है और फिर आशीर्वाद के रूप में ग्रहण की जाती है। यह छोटा भक्ति-पाठ्यक्रम इसके पीछे के भाव को समझाता है, जिसकी जड़ भगवद्गीता के उस श्लोक में है जहाँ भगवान कहते हैं कि प्रेम से अर्पित पत्र, पुष्प, फल या जल भी वे स्वीकार करते हैं। आप सीखेंगे कि भोग पारम्परिक रूप से कैसे बनाया और अर्पित किया जाता है, प्रसाद को कृतज्ञता और विनम्रता से कैसे ग्रहण और वितरित करें, और यह सरल साधना दैनिक जीवन को कैसे पवित्र बनाती है।
आप क्या सीखेंगे
- प्रसाद का अर्थ और अर्पण का भाव
- भोग बनाने और अर्पित करने की पारम्परिक विधि
- श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करना और बाँटना
पाठ
- 1परिचय: प्रसाद क्या है?🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 2शास्त्रीय आधार: पत्रं पुष्पं फलं तोयम्🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 3अर्पण के भाव से भोजन बनाना🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 4अर्पण की विधि: भोग और नैवेद्य🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 5प्रसाद ग्रहण करना और बाँटना🔒 नामांकन के बाद खुलेगा
- 6जीवन-पद्धति के रूप में प्रसाद🔒 नामांकन के बाद खुलेगा